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इण्‍डो-स्विस प्रशिक्षण केन्‍द्र (आइएसटीसी)

 

केन्द्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन (सीएसआइओ) के आइएसटीसी के नाम से लोकप्रिय, इण्डो-स्विस प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना वर्ष 1963 में स्विस फाउण्डेशन फॉर टैक्निकल एसिस्टैंस, ज्यूरिख, स्विटज़रलैंड के सहयोग से की गई थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने 18 दिसम्बर, 1963 को औपचारिक रूप से केन्द्र का उद्घाटन किया था।

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प्रारम्भ में इस केन्द्र की शुरूआत तीन वर्षीय प्रशिक्षण कोर्स उपकरण प्रौद्योगिकी में डिप्लोमा से की गई। बाद में समय की मॉंग को देखते हुए स्विस फाउण्डेशन के सहयोग से ही अस्सी के दशक में दो और कोर्स औद्योगिक इलैक्ट्रॉनिक्स में पोस्ट डिप्लोमा एवं डाई एण्ड मोल्ड मेकिंग में एडवांस्ड डिप्लोमा भी जोड़ दिए गए। वर्ष 1996 से पोस्ट डिप्लोमा इन इण्डस्ट्रियल इलैक्ट्रॉनिक्स का स्तर बढ़ा कर उसे चार वर्षीय एडवांस्ड डिप्लोमा इन मैकाट्रॉनिक्स एण्ड इण्‍डस्ट्रियल ऑटोमेशन कर दिया गया।

श्री फिरट्रज़ क्लॉस इसके प्रथम प्रिंसिपल थे, जिन्होंने पॉंच स्विस विशेषज्ञों एवं इतनी ही संख्या में भारतीय अध्यापन टीम के साथ केन्द्र से संबंधित विभिन्न कार्य प्रारम्भ किए। वर्ष 1968 में श्री गुरबख्श सिंह केन्द्र के पहले भारतीय प्रिंसिपल बने।

आइएसटीसी तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में सुप्रसिद्घ प्रशिक्षण केन्द्र है। आइएसटीसी प्रशिक्षणार्थियों  के कार्य प्रदर्शन से भारतीय उद्योग अत्यधिक लाभान्वित हुआ है और आज अपनी स्थापना के 49 वर्ष के बाद भी केन्द्र ने प्रशिक्षण की उत्कृष्ट गुणवत्ता को बनाए रखा है। प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना तत्कालीन परिदृश्य में निम्नलिखित उद्रदेश्यों के साथ की गई थी:

  • भारतीय उद्योगों को निर्माण क्षेत्र, संघटन कार्य एवं धातु कार्य के क्षेत्र एवं औद्योगिक स्वचालन में सहयोग के लिए कुशल मानव शक्ति तैयार करना
  • प्रीसिज़न मकैनिकल संघटकों की परिकल्पना और निर्माण, उत्पादन प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण में ताप उपचार, वेल्डिंग, इलैक्ट्रोप्लेटिंग आदि सम्मिलित थे एवं
  • मानव संसाधनों का प्रशिक्षण एवं कौशल विकास

इस प्रशिक्षण केन्द्र का मूल उद्देश्य इन्जीनियर/डिज़ाइनर तथा कुशल कर्मियों के बीच का अन्तर समाप्त करने के लिए ठोस प्रयोगात्मक पृष्ठभूमि वाले युवा तकनीकी कर्मी तैयार करना है।

पॉंच दशक की अवधि में इण्डो स्विस प्रशिक्षण केन्द्र एक सुदृढ़ शैक्षिक संस्थान के रूप में उभरा है, जिसके परिसर में अन्य के अतिरिक्त मुख्य स्कूल भवन, विभिन्न कोर्सों के लिए प्रयोगशालाएं, सभागार, सम्मेलन कक्ष एवं छात्रावास भवन र्हैं।

प्रशिक्षण केन्द्र अत्युत्तम प्रौद्योगिकी मशीनों से सज्जित है, जिसमें निरन्तर आधुनिकतम प्रौद्योगिकी का समावेश होता रहता है। प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षणार्थियों  में नैतिक अनुशासन, प्रेरणा एवं कार्य करने की योग्यता विकसित करने पर बल दिया जाता है। सैद्घान्तिक एवं प्रयोगात्मक प्रशिक्षण साथ-ही-साथ समान रूप से चलते हैं। सभी प्रशिक्षणार्थी व्यक्तिगत रूप से मशीनों पर कार्य करते हैं और उन्हें इस प्रकार से प्रशिक्षित किया जाता है कि वे औद्योगिक कार्य स्वतन्त्र रूप से कर सकें एवं वास्तविक कार्य-वातावरण से परिचित हो सकें। प्रशिक्षण केन्द्र में स्वत: कार्य करने की भावना के विकास-जैसे समय की पाबन्दी, स्वच्छता, आज्ञाकारिता, श्रम की गरिमा एवं वचनबद्घता आदि पर विशेष बल दिया जाता है। ये प्रशिक्षण केन्द्र के स्टाफ एवं प्रशिक्षणार्थियों  के लिए आधारभूत सूत्र हैं। प्रशिक्षण में उपरोक्त की पूर्ति स्व-नियंत्रण द्वारा की जाती है। प्रशिक्षणार्थियों एवं स्टाफ में मिल कर कार्य करने की भावना है। प्रशिक्षणार्थियों  के व्यवहार एवं अनुशासन का सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है तथा उसका रिकॉर्ड रखा जाता है। प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कार्य प्रदर्शन के मूल्यांकन की एक सुदृढ़ प्रणाली भी तैयार की गई है।

 

आइएसटीसी के प्रशिक्षु समय-समय पर पाठ्येतर गतिविधियों में भी प्रतिभागिता करते हैं जिनमें केन्द्र में रक्तदान शिविरों का आयोजन करके रक्तदान करना, एनसीसी में भाग लेना, ट्रेकिंग और पर्वतारोहण आदि कुछ प्रमुख हैं।

 

इसके अतिरिक्त जैव-चिकित्सा उपकरणों की मरम्मत एवं अनुरक्षण पर डीएसटी द्वारा प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम सेवा एवं अनुरक्षण केन्द्र, दिल्ली वर्ष 2002 से आयोजित कर रहा है। प्रारंभ में यह कार्यक्रम सिविल अस्पतालों के चिकित्सकों एवं तकनीशियनों के लिए आयोजित किए गए, किंतु बाद में इन्हें सामरिक क्षेत्र (रक्षा) के प्रतिभागियों के लिए आयोजित किया गया। दिल्ली केन्द्र ने देश के लेह, श्रीनगर, जम्मू, गोहाटी इत्यादि जैसे सामरिक क्षेत्रों में अब तक इस प्रकार के 33 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इन कार्यक्रमों का लक्ष्य चिकित्सा उपकरणों को खराब होने से बचाना है, जिससे कि देश की स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं में वृद्घि की जा सके।


 

 

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